Wednesday, 19 March 2014

अधूरी

छल कि परिभाषा,
और
प्रेम कि।
से परे,
य़े हृदय स्वयं को ,
नितांत एकांत में पाता है।
मुझे अब उजाला कहा सुहाता है ।

ना दर्द,ना आस,
ना कोई तलाश।
स्मृतियों का कोई चिन्ह नहीं,
अंलकार हीन काव्य सी,
मैं स्वयं बनीं एक पाषाण ।

बसंत भाव ना देती हैं।
मुझे चाँद कहा जलाता है।

सब झणिक,
काल्पनिक हैं।
भ्रम है।
मन सब जानता है ।
पर कर मनमानी पालने लगता हैं ,
एक और सपना..

ये नादान नहीं जानता पर,
सौ जतन कर ले अकेला ही रहेगा।
लाख लहरों में डूबे,
साहिल नहीं मिलेगा ।

जो भी पथिक मिला है ,
कोई और ही मंजिल लिए है।
धुआँ सा उठता है,
लेकिन बुझे सारे दिये है।

और फिर वो,
अपनी धुमिल आशाएँ लिए,
चले गए ढूंढने,
राह पर पड़ी धुल में,
उसके पैरों के निशान ।

अधूरे अहसासो को उनकी यादें,
ले जाती हैं वही,
उनके पूरे होने की उम्मीद में ।

और ले जाती रहेगी।
यह हृदय भी कहता है,
जाओ। यह सीढ़ियाँ उस छोर तक जाती है,
और प्रेम की उम्मीद कभी कम कहा होती है,
जब तक य़ाद ना मिटे ।

जाएँगे ही वो,
उनके पैरों में भी दम है और मन को किसने रोका है।
जाएँगे ही, जब तक उन्हें भरोसा है।

और मैं तो खुश हूँ,
और व्यस्त भी,
घरोंदे बनाने में,
उन पंझियो के,
जिनके घर नहीं है।

पहाड़ों पर बैठी हुई,
मुस्कराते देखती
बरसातो को बादलों में जाते हुए ! 

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