गुलमोहर के पेड़ के नीचे,
बैठी थी,
अधखिले मुरझाऐ फूलों
सी एक शाम ।
दोहराई गई कविता सी,
उदासीन उत्सुकता,
बेस्वाद ।
बेमान बना उपवान,
कौन करे स्वीकार,
ये झुलसाती कदम्ब बहार ...।
कौन कराऐ सोलह श़ृंगार,
उलझ बिखरे मुक्ताहार ।
जली हुई मेहँदी मेरे हाथों में,
गुलमोहर के फूलों सी,
झड़ती अश्रुओं के साथ ।
सखी,सुमन सुगंध सी,
बहती पवन संग,
कर सुधीपान,
हृदय में हाला सा उन्माद,
संभवतः नुतन आभास,
अन्तः मुक्त हुई दास ।
पिंगे भरता मन,
उपर, निचे,
धड़कने बढ़ाता,
प्रेम अब झूले सा प्रतीत होता है।
गाँव के मेले का झूला,
सावन में नीम के पेड़ बँधा झूला,
और निर्बोध बालक सा मन,
हठि,
सहमा सा पर जिद्द भी,
खिलौने पे ललचाता बेचारा मन ।
छूकर उसे,
एक पल ही,
भागता पगडंडियों पर,
बवरा सा मन ।
कभी मुंडेर पे,
कभी चौखट पे बैठा,
खोया खोया हारा सा मन ।
प्रेम मे ले वैराग,
गंगा तीर धुन लगाएँ बैठा,
श्याम ढूंढता मीरा सा मन ।
पिया पीर बढ़ाएँ,
बैर करे ना प्रित लगाएँ,
नित स्वांग रचाएँ,
पल पल तरसाएँ,
ना सोने दे ना जगाएँ,
दूर जाएँ कभी पास बुलाएँ,
जलाएँ,
सताएँ,
दिन रात ।
और,
सांझ आई है रे माई,
बेचैन करने रे,
ठंडी पुरवाई आई रे माई,
हिये भरने रे ।
उड उड ये बादरा कारे,
बुंदो से छेडे रे,
पिया परदेश में माई,
मेरे पाँव में बेड़े रे ।
कैसे अभिमानी साजान ,
ना शर्म का लेश रे,
ना तो खुद ही आवे रे माई,
ना भेजे संदेश रे ।
बैठी थी,
अधखिले मुरझाऐ फूलों
सी एक शाम ।
दोहराई गई कविता सी,
उदासीन उत्सुकता,
बेस्वाद ।
बेमान बना उपवान,
कौन करे स्वीकार,
ये झुलसाती कदम्ब बहार ...।
कौन कराऐ सोलह श़ृंगार,
उलझ बिखरे मुक्ताहार ।
जली हुई मेहँदी मेरे हाथों में,
गुलमोहर के फूलों सी,
झड़ती अश्रुओं के साथ ।
सखी,सुमन सुगंध सी,
बहती पवन संग,
कर सुधीपान,
हृदय में हाला सा उन्माद,
संभवतः नुतन आभास,
अन्तः मुक्त हुई दास ।
पिंगे भरता मन,
उपर, निचे,
धड़कने बढ़ाता,
प्रेम अब झूले सा प्रतीत होता है।
गाँव के मेले का झूला,
सावन में नीम के पेड़ बँधा झूला,
और निर्बोध बालक सा मन,
हठि,
सहमा सा पर जिद्द भी,
खिलौने पे ललचाता बेचारा मन ।
छूकर उसे,
एक पल ही,
भागता पगडंडियों पर,
बवरा सा मन ।
कभी मुंडेर पे,
कभी चौखट पे बैठा,
खोया खोया हारा सा मन ।
प्रेम मे ले वैराग,
गंगा तीर धुन लगाएँ बैठा,
श्याम ढूंढता मीरा सा मन ।
पिया पीर बढ़ाएँ,
बैर करे ना प्रित लगाएँ,
नित स्वांग रचाएँ,
पल पल तरसाएँ,
ना सोने दे ना जगाएँ,
दूर जाएँ कभी पास बुलाएँ,
जलाएँ,
सताएँ,
दिन रात ।
और,
सांझ आई है रे माई,
बेचैन करने रे,
ठंडी पुरवाई आई रे माई,
हिये भरने रे ।
उड उड ये बादरा कारे,
बुंदो से छेडे रे,
पिया परदेश में माई,
मेरे पाँव में बेड़े रे ।
कैसे अभिमानी साजान ,
ना शर्म का लेश रे,
ना तो खुद ही आवे रे माई,
ना भेजे संदेश रे ।
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